अमरकण्टक से ज़िन्दगी एक बहती हुई नदी की तरह है, कभी धूप से चमकती, तो कभी बादलों से ढँकी हुई। जब सब कुछ अच्छा चल रहा हो- जब सपनों को हकीकत के पंख मिल रहे हों और चेहरे पर मुस्कान खुद-ब-खुद आ रही हो, तब उस पल को पूरे मन से जी लें। क्योंकि समय की धारा रुकती नहीं। जैसे श्रीमद्भगवद्गीता में जीवन के परिवर्तनशील- स्वभाव का संदेश मिलता है, वैसे ही हर सुख भी एक सुंदर प्रवाह है! पर स्थायी नहीं। इसलिए जो भी अच्छा है, उसे महसूस करें , सहेजें और उसके लिए कृतज्ञ रहें।और जब समय कठिन हों , रास्ते धुंधले लगें, और मन में अनिश्चितता का बादल छा जाए, तब भी घबराने की आवश्यकता नहीं। दुख भी एक ऋतु की तरह है, आता है – ठहरता है, और फिर चला जाता है। जैसे घने अंधकार के बाद सूरज फिर उगता है, वैसे ही हर कठिनाई के बाद एक नई सुबह जन्म लेती है। जीवन का सत्य यही है कि कुछ भी स्थायी नहीं; ना सुख ना पीड़ा, ना परेशानी। इसलिए बुरे समय को अंत नहीं, बल्कि परिवर्तन की प्रस्तावना समझना चाहिए।अंततः जीवन हमें यही सिखाता है कि हर पल अस्थायी है, और इसी अस्थायित्व में उसकी सुंदरता छिपी है। सुख हो तो अहंकार नहीं, और दुख हो तो निराशा नहीं, बस संतुलन और धैर्य !! जो आज है – वह कल बदल जाएगा; इसलिए वर्तमान को पूरे हृदय से अपनाएं । यही समझ हमें भीतर से मज़बूत बनाती है और जीवन के हर उतार-चढ़ाव में शांति का अनुभव कराती है। सबका ही कल्याण हो गुरुपदाश्रित जानकी वल्लभ तीर्थ गिरी केम्प-अमरकंटक चातुर्मास






