दीपावली पूजन धनतेरस से चतुर्थी तक किया जाना चाहिए।

धनतेरस :- चूंकि तेरस की तिथि माह की शिवरात्रि होती है एवम हम वास्तव में शरीर मे वासित प्राण हैं और प्राण का धन ज्ञान होता है। और सतज्ञान धन के प्रदाता सतगुरु महादेव ही हैं, इसलिए धनतेरस तिथि को सतगुरुदेव महादेव की पूजा की जानी चाहिए।चौदस:- चौदस तिथि का मूलांक 5 पांच होता है धनतेरस को सतगुरुदेव महादेव की पूजा पश्चात ब्रम्ह पूजा की जानी चाहिए, ब्रम्ह का आशय अखिल ब्रम्हांड के विस्तार से है और इस सम्पूर्ण ब्रम्हांड अर्थात विस्तार के मूल अंग पंचमहाभूत धरती जल अग्नि वायु आकाश हैं। अतः पंचमहाभूत का ध्यान करते हुए ब्रम्ह पूजा की जानी चाहिये।अमावस्या :- अमावस्या की रात्रि को परम् सूक्ष्म जिसे पकड़ा व देखा ही नही जा सकता इसीलिए उसे शून्य भी माना गया है उस शून्य का ध्यान पूजा अमावस्या की रात्रि को की जानी चाहिए।वैसे भी सम्पूर्ण

सृष्टि को ब्रम्हांड पुकारा जाता है, ब्रम्हांड मेल है ब्रम्ह + अंड (अणु) का। ब्रम्ह विस्तार है तो अंड सुक्ष्म अर्थात परम् सूक्ष्म का विस्तार ही अखिल ब्रम्हांड है। एकम दूज व तीज :- सम्पूर्ण सृष्टि का मूल आधार शक्ति ही है व शक्ति अनादि व अनंत है जीवन के समस्त क्रिया कलापों का आधार शक्ति की तीन गुण सत्व, रज व तम हैं। तीनों में किसी भी गुण को पहला, दूसरा व तीसरा नही माना जा सकता तीनो में किसी भी गुण को प्रधानता नही दी जा सकती तीनों गुण समान है, व तीनो गुणों का प्रतीक त्रिशूल है। अर्थात तीनो गुणों के प्रतीक त्रिशूल में ध्यान पूजा तीनो रात्रि एकम, दूज व तीज को की जानी चाहिए।चतुर्थी:- वैसे तो समस्त रूप उन अनादि- अनंत शक्ति के हैं किंतु अनादि शक्ति का वह रूप जिसे अनादि शक्ति किन्ही महादेव स्वरूप को प्रदान करती है व उन महादेव स्वरूप के द्वारा उस मनुष्य को शिष्य के रूप में अंगीकार कर शिक्षित कर व परम् ज्ञान को उपलब्ध कर हमें गुरु मूर्ति के रूप में प्रदान करते हैं उन्हें ही परमात्मा स्वरूप स्वीकार कर गुरुमूर्ति पूजन चतुर्थी तिथि को करनी चाहिए, जिनके जीवन मे कोई योग्य व सक्षम गुरुमूर्ति ना हो उन्हें गणेश जी की पूजा करनी चाहिए।

धनतेरस 6 नवंबर शुक्रवार

चौदस 7 नवंबर शनिवार

अमावस्या 8 नवंबर रविवार

एकम 9 नवंबर सोमवार

दूज 10 नवंबर मंगलवार

तीज 11 नवंबर बुधवार

चतुर्थी 12 नवंबर गुरुवार

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