
“न्यायाधीश ताजुद्दीन आसिफ का फैसला: महिला से छेड़छाड़ के दोषी चिकित्सक को 2 वर्ष का सश्रम कारावास”

बालोद। चिकित्सकीय जांच के दौरान महिला से छेड़छाड़ करने के मामले में बालोद के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (एफटीसी) श्री ताजुद्दीन आसिफ ने आरोपी चिकित्सक हेमशंकर साहू पिता नरोत्तम साहू, उम्र 32 वर्ष, निवासी भरदाकला, थाना अर्जुन्दा, जिला बालोद को दोषी ठहराते हुए सश्रम कारावास की सजा सुनाई है।
न्यायालय ने आरोपी को भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 74 के तहत 2 वर्ष का सश्रम कारावास एवं ₹10,000 के अर्थदंड तथा धारा 75 के तहत 1 वर्ष का सश्रम कारावास एवं ₹5,000 के अर्थदंड से दंडित किया है। साथ ही न्यायालय ने समुचित जांच के बाद आदेश/निर्णय प्राप्ति की तारीख से दो माह के भीतर पीड़ित क्षतिपूर्ति योजना 2018 के तहत पीड़िता को पर्याप्त प्रतिकर प्रदान करने के लिए सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण बालोद को निर्देशित किया है।
अभियोजन के अनुसार, घटना 14 अगस्त 2026 की है। पीड़िता साईटिका बीमारी का उपचार कराने आरोपी चिकित्सक के पास पहुंची थी। दोपहर करीब 2 बजे आरोपी ने उसे जांच के लिए अपने चेम्बर में बुलाया। पीड़िता के साथ हरीश तिवारी भी अंदर गया था। जांच के दौरान आरोपी ने हरीश तिवारी को बाहर भेज दिया और पीड़िता के साथ कथित रूप से अश्लील एवं आपत्तिजनक हरकतें कीं।
पीड़िता ने शिकायत में बताया कि आरोपी ने उसका हाथ-बांह पकड़कर उसके शरीर के संवेदनशील अंग को छुआ तथा बाद में उसे अंदर के कमरे में चलने के लिए कहा। विरोध करने पर आरोपी ने उसके साथ जबरदस्ती करने का प्रयास किया। पीड़िता द्वारा शोर मचाने और दरवाजा खटखटाने पर बाहर मौजूद हरीश तिवारी एवं ड्रायवर पुष्पक पटेल वहां पहुंचे, जिसके बाद आरोपी ने दरवाजा खोला।
पीड़िता की लिखित शिकायत पर थाना बालोद में अपराध क्रमांक 431/2026, धारा 74 एवं 75(2) भारतीय न्याय संहिता के तहत अपराध दर्ज किया गया। विवेचना पूर्ण होने के बाद पुलिस ने 27 अगस्त 2026 को न्यायालय में अभियोग पत्र प्रस्तुत किया।
चिकित्सकीय पेशे की गरिमा पर न्यायालय की अहम टिप्पणी
मामले में न्यायालय ने चिकित्सकीय पेशे की सामाजिक प्रतिष्ठा और जिम्मेदारी को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। न्यायालय ने कहा कि चिकित्सक का पेशा समाज में विश्वास, सेवा, संवेदना और नैतिकता का प्रतीक माना जाता है। महिला जब चिकित्सक के संपर्क में आती है तो वह उसके ज्ञान और व्यावसायिक निष्ठा पर विश्वास करती है। उस विश्वास का दुरुपयोग कर लैंगिक उत्पीड़न किया जाना महिला की गरिमा एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन होने के साथ-साथ चिकित्सकीय पेशे के प्रति समाज की आस्था पर भी आघात है।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि जिस हाथ से जीवन की रक्षा की अपेक्षा की जाती है, यदि वही हाथ अपराध का माध्यम बन जाए तो यह केवल व्यक्तिगत आचरण का पतन नहीं, बल्कि पूरे पेशे से जुड़ी सामाजिक आस्था पर आघात है। सामाजिक प्रतिष्ठा दंड से बचने का कवच नहीं हो सकती।
प्रकरण में प्रस्तुत प्रबल एवं ठोस साक्ष्यों के आधार पर न्यायालय ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए उक्त सजा सुनाई।
अभियोजन की ओर से प्रकरण की पैरवी अतिरिक्त लोक अभियोजक सनद कुमार श्रीवास्तव ने की। वहीं मामले की संपूर्ण विवेचना प्र.आ. 131 नर्मदा कोठारी द्वारा की गई।






