
“आला हजरत की जिंदगी इल्म,अदब और इश्क-ए-रसूल का पैगाम : मौलाना शकील चिश्ती”

बालोद :– आला हजरत इमाम अहमद रजा खान फाजिले बरेलवी के विसाल के मौके पर रविवार को जामा मस्जिद बालोद में विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस अवसर पर जामा मस्जिद के पेश इमाम मौलाना शकील चिश्ती ने आला हजरत की जिंदगी, उनकी इल्मी और दीनी खिदमात तथा उनकी लिखी किताबों और नातों पर विस्तार से रोशनी डाली।

मौलाना शकील चिश्ती ने कहा कि आला हजरत अहमद रजा खान फाजिले बरेलवी ने अपनी पूरी जिंदगी कुरआन व सुन्नत की तालीम, इल्म की रोशनी फैलाने और पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मोहम्मद सल्लअल्लाहो अलैही वस्सल्लम से मोहब्बत का पैगाम आम करने में गुजार दी। उन्होंने कहा कि आला हजरत सिर्फ एक बड़े आलिम और मुफ़्ती ही नहीं, बल्कि बेहतरीन लेखक और शायर भी थे।
उन्होंने बताया कि आला हजरत ने अरबी, फारसी और उर्दू में अनेक महत्वपूर्ण किताबें लिखीं। उनकी प्रसिद्ध कृति ‘फतावा रजविया’ इस्लामी कानून और धार्मिक मार्गदर्शन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इसके अलावा उनकी मशहूर नात ‘मुस्तफा जाने रहमत पे लाखों सलाम’ आज भी महफिल-ए-मिलाद और अन्य धार्मिक आयोजनों में अकीदत के साथ पढ़ी जाती है।
मौलाना शकील चिस्ती ने आला हजरत की जिंदगी के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उन्होंने कम उम्र में ही धार्मिक और सांसारिक ज्ञान में गहरी दक्षता हासिल कर ली थी। उनका जीवन सादगी, तकवा, इल्म और अदब की मिसाल था। उन्होंने हमेशा लोगों को नेक रास्ते पर चलने, दूसरों के हक का ख्याल रखने और आपसी भाईचारा कायम रखने की सीख दी।
उन्होंने कहा कि आला हजरत की तालीम का मकसद सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं था, बल्कि इंसान को बेहतर इंसान बनाना भी था। आज के दौर में उनके इल्मी और नैतिक संदेश को समझना और नई पीढ़ी तक पहुंचाना बेहद जरूरी है।
तकरीर के बाद अकीदतमंदों ने सामूहिक रूप से सलातो सलाम पढ़ा और मुल्क में अमन, भाईचारे, खुशहाली तथा आपसी मोहब्बत के लिए दुआ की। कार्यक्रम के समापन पर मौजूद हाजरीन में शिरनी तकसीम की गई।






